अंग आरू अंगिका के अन्तर्राष्ट्रीय आयाम | International Facets of Ang-Angika
कुंदन अमिताभ | Kundan Amitabh
प्रथम संस्करण | मार्च, 2003
भूमिकावत
इस पुस्तक कों लिखने की प्रक्रिया पिछले सोलह - सतरह वर्षाें से जारी थी। इतने वर्षाें के पश्चात जब यह छपकर पुस्तक रुप में तैयार हो रहीं है तो मुझे सहज विश्वास नहीं हो पा रहा है।
बात 1986 ई. के अगस्त – सितंबर की है... जब पंडित जवाहरलाल नेहरू रचित “ग्लीम्पसेज ऑफ वल्र्ड हिस्ट्री” और उनकी ही पुस्तक “डिस्कवरी ऑफ इंडिया” अध्ययन के दौरान मुझे पहली बार इस बात का अहसास हुआ कि अंग संस्कृति का दायरा भारतवर्ष तक ही सीमित नहीं रहा है। भाषा और संस्कृति के पारस्परिक संबंध की जानकारी रहने से मुझे इस महत्वपूर्ण तथ्य का अंदाजा लगाने में अधिक वक्त नहीं लगा कि इस तरह तो ‘अंगिका’ भी अंग देश तक सीमित न रहकर एक अलग तरह की वैश्विक दायरे में फैली रही होगी। यह विषय मुझमें एक नई किस्म की उत्सुकता जगा गया।
मैंने अंग और अंगिका के अन्तर्राष्ट्रीय संदर्भों के लिये अंग और अंगिका संबंधी उपलब्ध लगभग सभी पुस्तकों का पन्ना पन्ना उलट डाला पर इस संबंध में विशेष कुछ नहीं मिला। मैं थोडा विस्मित भी था कि आज तक अंगिका के किन्ही विद्वान का ध्यान इन बातों की ओर क्यों नहीं गया। मेरे जेहन के किसी कोने में एक ध्येय स्थापित होता जा रहा था – अंग और अंगिका के अन्तर्राष्ट्रीय आयाम को प्रामाणिक एवं तर्कसंगत ढंग से साहित्यिक जगत के समक्ष रखना एवं इस तरह अंग संस्कृति एवं अंगिका भाषा की उत्कृष्टता एवं व्यापकता से उन्हें अवगत कराना एवं अंगिका आंदोलन को एक नई गति देना।
मैने भाषा और संस्कृति एवं विश्व एवं भारत के प्राचीन इतिहास से संबंधित महत्वपूर्ण पुस्तकों के अध्ययन का काम शुरू कर दिया। अपने ही घर में जो मेरे पिताजी के पुस्तकों के प्रति अगाध प्रेम के चलते तैयार हो गया एक अच्छा सा पुस्तकालय है.. में उपलब्ध पुस्तकों का अध्ययन तो किया ही। साथ ही मैंने पटना के सिन्हा लाइब्ररी से लेकर बम्बई के सेन्ट्रल लाइब्ररी तक में उपलब्ध पुस्तकों के अध्ययन का प्रयास भी किया। पुस्तक मेले.. पुस्तक प्रदर्शनियाँ.. तथा पटना .जबलपुर. . दिल्ली. .बम्बई. .कलकत्ता.. पूणे.. बंगलोर. .चंडीगढ जैसे शहरों की अच्छी अच्छी पुस्तक दुकानों में एवं फुटपाथों पर बिकते पुस्तकें भी मेरी नजर में आने से नहीं बचे। मेरी नजर किसी भी पुस्तक में केवल अंग, अंगिका , अंगभाषा, चम्पा आदि जैसे शब्दों की खोज में लगी रहतीं थीं। संदर्भिका में उनमें से कुछ पुस्तकों के उल्लेख है। मैं इन सभी पुस्तकों के लेखकों एवं प्रकाशकों का बहुत आभारी हूँ क्योंकि यही पुस्तकें किसी न किसी तरह से इस पुस्तक के प्रारूप को अंतिम स्वरूप देने में सहायक सिध्द हुई हैं। एक तरह से यह पुस्तक देश और विदेश के अनगिनत सहित्यकारों एवं इतिहासविदों के अथक प्रयासों और गहन अध्ययन एवं शोध के परिणाम हैं। अंग संस्कृति एवं अंगिका भाषा के. व्यापकता के संदर्भ में विश्लेषणात्मक ढंग से तथ्यों को यथासंभव एक जगह संग्रहित कर देना मात्र ही मेरी उपलब्धि रही है।
यह बात अगस्त 1995 ई. की है। डॉ. नरेश पांडेय चकोर द्वारा सम्पादित अंगिका भाषा की मासिक पत्रिका 'अंग माधुरी' के रजत जयंती विशेषांक का प्रकाशन होेने जा रहा था। उस समय तक मेरे पास इस पुस्तक से संबंधित इतनी सामग्री एकत्रित हो गयी थी कि एक अच्छा खासा निबंध तैयार हो जाता। पता नहीं क्यों मुझे लगा यह निबंध इस विशेषांक में अवश्य जाना चाहिए। मैंने अंग और अंगिका के अन्तर्राष्ट्रीय परिप्रेक्ष्य में इसकी उत्कृष्टता एवं व्यापकता को साहित्यिक जगत के समक्ष रखने में और अधिक विलंब नहीं करना चाहता था। मेरा मानना था कि इससे अंगिका को दीन हीन नजरिये से देखने की आम प्रवृत्ति में बदलाव आएगा और अंगिका आंदोलन के अन्तर्राष्ट्रीय आयाम से जुडे कुछ महत्वापूर्ण तथ्यों को समाविष्ट करते हुए ‘अंग देश से बाहर अंगउपनिवेश’ शीर्षक निबंध लिखा जो अंग माधुरी के रजत जयंती विशेषांक में प्रकाशित हुई थी।
मैं अब लोगों की प्रतिक्रिया का इंतजार कर रहा था। आशा के अनुरूप इस निबंध का काफी स्वागत हुआ था। मुझे ऐसा प्रतीत हुआ कि अंगिका आंदोलन में संघर्षरत साहित्यकारों का मनोबल काफी ऊँचा हुआ है। डा. चकोर ने मेरे इस निबंध को अनोखा बताया और उनके अनुसार वे पहली बार अंगिका के इस अन्तर्राष्ट्रीय आयाम से अवगत हो रहे थे। काफी लोगों ने ‘अंग और अंगिका’ के अन्तर्राष्ट्रीय आयाम के विविध पक्षों पर पुस्तक लिखने का जोरदार आग्रह किया। पिछले सात वर्षों से मुंबई की भागदौड की जिंदगी जैसे रेलमपेल में फँसें रहने के कारण मुझे तो दूर दूर तक कोई आशा की किरण नहीं दिखाई दे रही थी कि पुस्तक प्रकाशन की दिशा में कुछ काम कर पाऊँ । मेरे पूज्य पिताजी श्री गोरे लाल मनीषी ने भी पुस्तक प्रकाशन के लिये जब ऐसा ही स्निग्ध आग्रह किया तो मेरे लिये यह आदेश ही था।
यह कोई जरूरी नहीं कि जो कुछ इस पुस्तक में लिखा गया है उससे सभी सहमत ही हों। खुद मैं ही जब ‘अंग देश से बाहर अंग उपनिवेश’ की पांडुलिपि लेकर डा. चकोर के पास गया था तो मुझमें थोडी सी झिझक थी। मुुझे लगा था वे कहेंगे, पता नहीं क्या-क्या लिखते रहते हो । ऐसा भी हो सकता है भला कि अंगिका का अस्तित्व वियतनाम और कम्बोडिया जैसे देशों में हो और संसार को पता न चले ? आदि आदि। पर साथ ही मैं घोर विश्वास से भी भरा था। यह विश्वास मैंने इस विषय पर काफी अध्ययन के पश्चात ही अर्जित किया था । मुझे जो सही लगा मैंने लिख दिया। यह संभव है कि अंगनिवासी और अंगिकाभाषी होने के नाते मैं अपनी अंग संस्कृति और अंगिका भाषा की उत्कृष्टता साबित करने के लिये – थोथे दलील देता फिर रहा हूँ। पर जवाहरलाल नेहरू. राहुल सांकृत्यायन, भगवतशरण उपाध्याय, सत्यकेतु विद्यालंकार, कई फ्रेंच विव्दानों जैसे लोग न तो अंग निवासी थे न ही उनकी भाषा अंगिका थी। जब वे लोग भी अंग और अंगिका के पक्ष में ऐसी ही दलीलें देते नजर आते हैं तो इन्हें किस अर्थ में लिया जाएगा ।
यह बतलाना काफी मुश्किल है कि कैसे मैंने अपने कैरियर के महत्वपूर्ण अवसरों को भी दाँव पर लगाकर इस पुस्तक के लेखन के लिये वक्त निकाला । मुझे लगता हैं कि गणपति की कृपा के बगैर यह संभव ही नहीं था।
यह भी स्पष्ट है की पुस्तक प्रकाशन में विभिन्न वजहों से विलंब हुआ है। पर मुख्य वजह रही अधिकाधिक सामग्रियों के साथ पुस्तक को उत्कृष्टतम एवं प्रामाणिक रूप से प्रकाशित करने की तमन्ना।
वास्तविकता तो यह है कि प्रस्तुत पुस्तक का लेखन व प्रकाशन किसी एक व्यक्ति के वश की बात नहीं है। इसके लिये तो संस्थागत समूहिक प्रयास की जरूरत होती हैं। इस पुस्तक को तैयार करने के लिये व्यक्तिगत तौर पर मेरी निष्ठा और वर्षों के परिश्रम कहाँ तक सफल हुए इसका निर्णय तो विद्वान पाठक ही करेंगे। यह संभव है कि पुस्तक में कई त्रुटियँ रह गई हों। एवं कई तथ्यों का समावेश ही न हो पाया हो। इसके लिये क्षमा प्रार्थी हूँ। आपके बहुमूल्य सुझावों एवं प्रतिक्रियाओं का सदैव इंतजार रहेगा। आपके सुझाव पुस्तक के आगामी संस्करण की रूपरेखा निरूपित करने में सहाय्यक सिध्द होंगे।
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